थोड़ी बारिश, थोड़ी कोशिश, थोड़ी शिद्दत हो गयी
थोड़ी हिम्मत, थोड़ी किस्मत, थोड़ी उल्फत हो गयी |
तुम मिले जो इस तरह तो
थोड़ी चाहत हो गयी |
तनहा से बैठे हम थे ऐसे
पल थे कुछ गुमनाम से
तुम जो बैठे पलकों में कल से
थोड़ी राहत हो गयी |
आज सुबह हँस रही है तेरी इस मुस्कान से
हम दीवाने हो रहे हैं तेरे उस अभिमान पे |
हंसके भी आज जीने की
थोड़ी मोहलत हो गयी |
सूरत जो ऐसी तुम ने थामी
सूरज भी मुरझा गया,
पल यहाँ रोशन हुआ तो
थोड़ी हैरत हो गयी |
कह ना पाए कुछ ना तुमसे
लफ़्ज़ों से लाचार हुए,
देखते ही रह गए बस
ऐसी हालत हो गयी |
साथ चलने तुम लगे भी
और तुमको ये पता नहीं,
साए के संग चलने की भी
थोड़ी आदत हो गयी |
तेरे आगे झुकने लगे जब
दूर तब रहने लगा रब,
और तुमसे क्या कहें अब
थोड़ी जन्नत हो गयी |
इस सुबह के दरम्यां ही
सारी हसरत हो गयी |
रोज़ ऐसी ही सुबह की
थोड़ी मन्नत हो गयी...
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Sunday, October 10, 2010
Sunday, July 4, 2010
ऐ अंकुश...
आज इतना क्यों डगमगा रहा है अंकुश,
उस दिये को भी अपने आगोश में जलने दे|
कहने से इतना क्यों डर रहा है अंकुश,
उसके आलोक को अपने सिरे भी तो रहने दे|
कल्पनाओं के साए में रहकर, ऐ अंकुश,
क्यों कर रहा है हक़ीक़त की उपेक्षा|
बहने दे उन लफ़्ज़ों को हवाओं में अंकुश,
बेसब्र होने लगी है पल-दो-पल उनकी अपेक्षा|
उनकी ख़ामोशी भी अब बोलने लगी है अंकुश,
अब तो खुली आँखों से देखना सीख ले|
थोड़ी-थोड़ी देर भी अब होने लगी है अंकुश,
अंधेरे से पहले-पहल ही दीवार भींच ले|
कब तक अपने अश्रु पीता रहेगा, ऐ अंकुश,
कुछ उनके हक़ में गिर भी तो जाने दे|
उनकी पूजा में कब तक त्याग करेगा अंकुश,
उस ख़ुदा को अपनी प्रार्थना सुन भी तो लेने दे|
आज कह रहा हूँ, कल शायद ना कहूँ अंकुश,
आज वज़ह भी है और वाक़या भी|
आज यहाँ मैं हूँ, कल शायद ना रहूं अंकुश,
आज तू भी वहाँ है और वो भी...
इतनी देर ना कर देना कहीं अंकुश,
कि उनकी मंज़िल ही बदलने लगे|
हमसफर तो तेरे सामने ही है अभी अंकुश,
कहीं उनके कदम भी ना डगमगाने लगे|
दबी-दबी सासें लिए क्यों चल रहा है अंकुश,
आज ज़रा सी हिम्मत तू और कर ले|
कहने से इतना क्यों डर रहा है अंकुश,
ज़िंदगी के लिए, ऐ अंकुश, एक आख़री बार मर ले...
Sunday, March 21, 2010
आंसू बन कर निकल पड़ा मैं...
आंसू बन कर निकल पड़ा मैं,
एक पतली पाक सी धार बन कर चल पड़ा मैं,
आँखों के कोनों से रास्ता बनाता हुआ
धीरे-धीरे नीचे गिर पड़ा मैं|
अपनी मर्ज़ी का मालिक कभी न बन सका मैं,
दूसरों की नज़रों से दुनिया देखता रहा मैं,
अपने मकसद के बारे में कोई ख़बर नहीं थी इससे पहले कभी
उनकी आँखों की गहराइयों में छिपा सुकून से सोता रहा मैं|
सामने सी आती हुई सर्द हवा का झोंका लुभाया करती थी मुझे,
अपने साथ उड़ने को जैसे बुलाया करती थी मुझे,
नम तो मैं हमेशा से ही रहा हूँ
पर हर बार मानसून के पहले जाने क्यों भिगोया करती थी मुझे|
उत्सुक था वजह जानने के लिए मेरे अस्तित्व की,
पर बताने वाला कोई नहीं मिला कभी|
भयभीत था आने वाले उस अनजान राह से,
पर दिखाने वाला कोई नहीं मिला कभी|
कई आड़े-तिरछे आकारों को पार कर
अचानक एक बड़े ढ़लान पर जा अड़ा|
एक हमशक्ल मुझे मेरा मिला जो
मुझे देखकर मुस्कुराया और फिर मेरे साथ चल पड़ा|
मैंने पुछा उससे 'कौन हो? क्यों हो?'
एक आम अजनबी सरीके मुझे देखा और बोला-
'कोई लिखित इतिहास नहीं है मेरे यहाँ होने की,
कभी हँसते-हँसते तो कभी रोते-बिलखते हूँ मैं निकाला गया'|
इससे पहले की हम धरती को छू पाते,
किसे ने हमारे होने की वजह उनसे पूछ ही लिया|
कुछ ही पलों की आहट थी की
उन्होंने सारी भावनाएँ शब्दों के रूप में उगल दिया|
जीवन रुपी नाट्य के अर्ध भाग में
परदे के खुलते ही रहस्य से रू-ब-रू हो गया|
जिन अभिनेताओं के पंखहीन पंछी सामान हैं,
उनकी भावना-अभिव्यक्ति के लिए मुझे बनाया गया|
एक पतली पाक सी धार बन कर चल पड़ा मैं,
आँखों के कोनों से रास्ता बनाता हुआ
धीरे-धीरे नीचे गिर पड़ा मैं|
अपनी मर्ज़ी का मालिक कभी न बन सका मैं,
दूसरों की नज़रों से दुनिया देखता रहा मैं,
अपने मकसद के बारे में कोई ख़बर नहीं थी इससे पहले कभी
उनकी आँखों की गहराइयों में छिपा सुकून से सोता रहा मैं|
सामने सी आती हुई सर्द हवा का झोंका लुभाया करती थी मुझे,
अपने साथ उड़ने को जैसे बुलाया करती थी मुझे,
नम तो मैं हमेशा से ही रहा हूँ
पर हर बार मानसून के पहले जाने क्यों भिगोया करती थी मुझे|
उत्सुक था वजह जानने के लिए मेरे अस्तित्व की,
पर बताने वाला कोई नहीं मिला कभी|
भयभीत था आने वाले उस अनजान राह से,
पर दिखाने वाला कोई नहीं मिला कभी|
कई आड़े-तिरछे आकारों को पार कर
अचानक एक बड़े ढ़लान पर जा अड़ा|
एक हमशक्ल मुझे मेरा मिला जो
मुझे देखकर मुस्कुराया और फिर मेरे साथ चल पड़ा|
मैंने पुछा उससे 'कौन हो? क्यों हो?'
एक आम अजनबी सरीके मुझे देखा और बोला-
'कोई लिखित इतिहास नहीं है मेरे यहाँ होने की,
कभी हँसते-हँसते तो कभी रोते-बिलखते हूँ मैं निकाला गया'|
इससे पहले की हम धरती को छू पाते,
किसे ने हमारे होने की वजह उनसे पूछ ही लिया|
कुछ ही पलों की आहट थी की
उन्होंने सारी भावनाएँ शब्दों के रूप में उगल दिया|
जीवन रुपी नाट्य के अर्ध भाग में
परदे के खुलते ही रहस्य से रू-ब-रू हो गया|
जिन अभिनेताओं के पंखहीन पंछी सामान हैं,
उनकी भावना-अभिव्यक्ति के लिए मुझे बनाया गया|
Sunday, March 14, 2010
बड़ा हो गया हूँ...
लोग कहते हैं काफी बड़ा हो गया हूँ,
सोचने लगा हूँ, समझने लगा हूँ,
आँखों से अपनी दुनिया देखने लगा हूँ,
शब्द तो बड़े अच्छे थे उनके पर उनका अर्थ शायद थोड़ा अलग था...
जिनकी ऊँगली पकड़ कर चलना सीखा था कभी,
बार-बार गिरकर भी दोबारा खड़ा होना सीखा,
अब उनका हाथ पकड़ने लग गया हूँ
और लोग कहते हैं काफी बड़ा हो गया हूँ|
याद भी नहीं हैं वो पहले शब्द,
जिन्हें सुनने के लिए घंटों सामने बैठे रहते|
अब उन्ही शब्दों को ऊँचा बोलने लग गया हूँ,
और लोग कहते हैं काफी बड़ा हो गया हूँ|
आँखों में आंसू तो तब भी थे उनके जब
पहली बार स्कूल में अकेले छोड़ा था मुझे|
अब लगता है जैसे उन आंसुओं की वजह बदलने लग गया हूँ
और लोग कहते हैं काफी बड़ा हो गया हूँ|
दो साल की उम्र में बीमार होना मेरा एक सजा थी उनके लिए
रात भर खुली आँखों के साथ सोते थे|
और आज भी जब मैं उन्हें रात भर सोने नहीं देता हूँ
तो लोग कहते हैं काफी बड़ा हो गया हूँ|
पट्टियाँ तो मात्र एक बहाना हुआ करती थी,
आस-पास होने के लिए बस एक वजह की तलाश रहती थी उन्हें|
आज जब उनसे दूर रहने की वजह सोचना सीख गया हूँ
तो लोग कहते हैं काफी बड़ा हो गया हूँ|
पैसे तो तब भी नहीं थे मेरे पास,
पर कभी ज़रुरत नहीं पड़ी उनके अस्तित्व के बारे में सोचने की|
पर जब अपने ही घर चोरी करने लगा,
तब लोग कहने लगे काफी बड़ा हो गया हूँ|
इतना सोचने के बाद अचानक मैं स्तब्ध सा रह गया हूँ
भले ही जीवन के मायने कुछ बदलते हुए से दिख रहे हैं आज...
मैं तो आज भी उस पुराने वाले कल में जीना चाहता हूँ,
हमेशा दो साल का ही रहना चाहता हूँ|
सोचने लगा हूँ, समझने लगा हूँ,
आँखों से अपनी दुनिया देखने लगा हूँ,
शब्द तो बड़े अच्छे थे उनके पर उनका अर्थ शायद थोड़ा अलग था...
जिनकी ऊँगली पकड़ कर चलना सीखा था कभी,
बार-बार गिरकर भी दोबारा खड़ा होना सीखा,
अब उनका हाथ पकड़ने लग गया हूँ
और लोग कहते हैं काफी बड़ा हो गया हूँ|
याद भी नहीं हैं वो पहले शब्द,
जिन्हें सुनने के लिए घंटों सामने बैठे रहते|
अब उन्ही शब्दों को ऊँचा बोलने लग गया हूँ,
और लोग कहते हैं काफी बड़ा हो गया हूँ|
आँखों में आंसू तो तब भी थे उनके जब
पहली बार स्कूल में अकेले छोड़ा था मुझे|
अब लगता है जैसे उन आंसुओं की वजह बदलने लग गया हूँ
और लोग कहते हैं काफी बड़ा हो गया हूँ|
दो साल की उम्र में बीमार होना मेरा एक सजा थी उनके लिए
रात भर खुली आँखों के साथ सोते थे|
और आज भी जब मैं उन्हें रात भर सोने नहीं देता हूँ
तो लोग कहते हैं काफी बड़ा हो गया हूँ|
पट्टियाँ तो मात्र एक बहाना हुआ करती थी,
आस-पास होने के लिए बस एक वजह की तलाश रहती थी उन्हें|
आज जब उनसे दूर रहने की वजह सोचना सीख गया हूँ
तो लोग कहते हैं काफी बड़ा हो गया हूँ|
पैसे तो तब भी नहीं थे मेरे पास,
पर कभी ज़रुरत नहीं पड़ी उनके अस्तित्व के बारे में सोचने की|
पर जब अपने ही घर चोरी करने लगा,
तब लोग कहने लगे काफी बड़ा हो गया हूँ|
इतना सोचने के बाद अचानक मैं स्तब्ध सा रह गया हूँ
भले ही जीवन के मायने कुछ बदलते हुए से दिख रहे हैं आज...
मैं तो आज भी उस पुराने वाले कल में जीना चाहता हूँ,
हमेशा दो साल का ही रहना चाहता हूँ|
Friday, September 11, 2009
मैंने कहा था निशा से
मैंने कहा था निशा से रुक जाओ
चंद लम्हे और दे दो हमें,
उड़ने दो उन हसीन सपनो के संग,
जिन्होंने उन चंद लम्हों में ही जीना सीखाया हमें |
मैंने कहा था निशा से रुक जाओ
ना दो कोई मौका हमारी पलकों को झपकने का,
डूब जाने दो अपने काजल के नशे में,
परछाई बन जाने दो मुझे अपनी उस पाक् परछाई का |
मैंने कहा था निशा से रुक जाओ
चलने दो उन सर्द हवाओं को,
बंधे रहने दो सारी फिजाओं को साथ-साथ,
जाने से रोक लो मेरे उस पलभर के सुकून को |
मैंने कहा था निशा से रुक जाओ
कोई और आप पर नज़र उठा कर देखे ये हमें अच्छा नहीं लगता,
आप कुछ पल के लिए ही दूर क्यों न हों,
पर मैं खुद को ही अच्छा नहीं लगता |
मैंने कहा था निशा से रुक जाओ
साथ चलो तुम मेरे, मेरी प्रेरणा बनकर,
चलने दो मेरी कलम को तृप्ति की राह पर,
गूंजती रहो मेरे गीतों की सरगम बनकर |
मैंने कहा था निशा से रुक जाओ
मत छोडो मुझे अकेले इतने सारे तारों के बीच,
डर से सहम जाता हूँ मैं,
जब खडा पता हूँ खुद को मैं इतने सारे कच्चे रिश्तों के बीच |
लिखते-लिखते रात गहरी होने लगी है अब,
अर्ज करते-करते कई मौसम गुज़र गए,
निशा ने रुकने का फैसला तो कर लिया
पर हम कई महीनों के लिए निशाचर बन गए |
चंद लम्हे और दे दो हमें,
उड़ने दो उन हसीन सपनो के संग,
जिन्होंने उन चंद लम्हों में ही जीना सीखाया हमें |
मैंने कहा था निशा से रुक जाओ
ना दो कोई मौका हमारी पलकों को झपकने का,
डूब जाने दो अपने काजल के नशे में,
परछाई बन जाने दो मुझे अपनी उस पाक् परछाई का |
मैंने कहा था निशा से रुक जाओ
चलने दो उन सर्द हवाओं को,
बंधे रहने दो सारी फिजाओं को साथ-साथ,
जाने से रोक लो मेरे उस पलभर के सुकून को |
मैंने कहा था निशा से रुक जाओ
कोई और आप पर नज़र उठा कर देखे ये हमें अच्छा नहीं लगता,
आप कुछ पल के लिए ही दूर क्यों न हों,
पर मैं खुद को ही अच्छा नहीं लगता |
मैंने कहा था निशा से रुक जाओ
साथ चलो तुम मेरे, मेरी प्रेरणा बनकर,
चलने दो मेरी कलम को तृप्ति की राह पर,
गूंजती रहो मेरे गीतों की सरगम बनकर |
मैंने कहा था निशा से रुक जाओ
मत छोडो मुझे अकेले इतने सारे तारों के बीच,
डर से सहम जाता हूँ मैं,
जब खडा पता हूँ खुद को मैं इतने सारे कच्चे रिश्तों के बीच |
लिखते-लिखते रात गहरी होने लगी है अब,
अर्ज करते-करते कई मौसम गुज़र गए,
निशा ने रुकने का फैसला तो कर लिया
पर हम कई महीनों के लिए निशाचर बन गए |
Wednesday, May 27, 2009
फसकर रह गया हूँ
This is a story of a boy named Ishaan from Godhra, the administrative city of Panchmahal district in Gujarat who now is a youngster who can take his own decisions. He is one among the targets of the deadly Gujarat riots. He belonged to a peaceful, middle-class, Hindu family living in a Muslim area, their residence being situated just opposite to the mosque. The boy lost his whole family in the riots when he was just 7, leaving himself all on his own. All of his relatives assumed him to be dead and never ever tried to find his body, they never showed themselves up in that Muslim area.
Now this boy was taken up by a tea-vendor, having his stall near the outskirts of Sant Road which led to Dahod. Unlike other children working for livelihood in the area smoking and gambling during their free times, he chose to write. This is an article from his book of write-ups speaking the words of his life-
एक पत्ते की तरह थी मेरी ज़िन्दगी कभी
हरी तो थी पर
सहारे पर जी रही थी,
हवा चलती उधर मुड़ जाती थी |
एक दिन एक झोंका हवा का ऐसा आया
कि वो पेड़ जड़ से ही उखड़ आया |
अपने फूल पत्तियों को बचाने कि भरपूर कोशिश की उसने
पर बिना किसी सहारे के वो सीधा ज़मीन पर आ गिरा |
उसे पता था गिनती की ही सांसें बची हुई थी उसके पास,
ज़िन्दगी की रफ़्तार उसके हाथों में नहीं थी अब |
आने वाली बारिश की पहली बूँदें
बहाकर ले जाने वाली थी उसे |
उस पेड़ से टूटकर अलग तो हो गया था मैं
पर पास ही पड़ा रहा उसके
देखता रहा उसे, उसके उन आखरी कुछ लम्हों में
साँसे रुकीं उसकी ता एहसास हुआ, कितना अकेला हूँ इस भीड़ में |
रेंगता रहा इधर-उधर, किसी सहारे की तलाश में
पेट ने उत्पात मचाई तो लगा जैसे
खुद का सहारा बनने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है मेरे पास
जान हथेली पर रखकर घुस गया इंसानों सी भरे हुए जंगल में |
अचानक एक कांटेदार झाड़ ने रोककर आसरा दिया, सुरक्षा दी
जीवन के कुछ रंग देकर ही खुश कर दिया था उसने मुझे,
अब तो एक पौधा बनने लायक हो गया हूँ मैं,
फिर भी उस झाड़ में ही फसकर रह गया हूँ मैं |
Now this boy was taken up by a tea-vendor, having his stall near the outskirts of Sant Road which led to Dahod. Unlike other children working for livelihood in the area smoking and gambling during their free times, he chose to write. This is an article from his book of write-ups speaking the words of his life-
एक पत्ते की तरह थी मेरी ज़िन्दगी कभी
हरी तो थी पर
सहारे पर जी रही थी,
हवा चलती उधर मुड़ जाती थी |
एक दिन एक झोंका हवा का ऐसा आया
कि वो पेड़ जड़ से ही उखड़ आया |
अपने फूल पत्तियों को बचाने कि भरपूर कोशिश की उसने
पर बिना किसी सहारे के वो सीधा ज़मीन पर आ गिरा |
उसे पता था गिनती की ही सांसें बची हुई थी उसके पास,
ज़िन्दगी की रफ़्तार उसके हाथों में नहीं थी अब |
आने वाली बारिश की पहली बूँदें
बहाकर ले जाने वाली थी उसे |
उस पेड़ से टूटकर अलग तो हो गया था मैं
पर पास ही पड़ा रहा उसके
देखता रहा उसे, उसके उन आखरी कुछ लम्हों में
साँसे रुकीं उसकी ता एहसास हुआ, कितना अकेला हूँ इस भीड़ में |
रेंगता रहा इधर-उधर, किसी सहारे की तलाश में
पेट ने उत्पात मचाई तो लगा जैसे
खुद का सहारा बनने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है मेरे पास
जान हथेली पर रखकर घुस गया इंसानों सी भरे हुए जंगल में |
अचानक एक कांटेदार झाड़ ने रोककर आसरा दिया, सुरक्षा दी
जीवन के कुछ रंग देकर ही खुश कर दिया था उसने मुझे,
अब तो एक पौधा बनने लायक हो गया हूँ मैं,
फिर भी उस झाड़ में ही फसकर रह गया हूँ मैं |
Friday, May 22, 2009
चोट
रात भर सो ना सका मैं तेरी याद में
देखता रहा बस तेरी उस मृत शरीर को,
मंडराने लगे वो सारे पल आँखों के सामने एक-एक करके
जो गुजारे थे मैंने कभी तेरे साथ |
Orkut की वो खुली हुई scrapbook,
Facebook पर खेले वो सारे time-pass games,
Gtalk की वो ping-ping की आवाज़,
Messenger की वो smileys और वो नशीली लाल backgrounds,
CS की वो go-go-go,
AOE की वो भोंपू ,
Mario की वो उछल-कूद,
Taken की वो घटिया graphics,
50 cent और linkin park के वो romantic numbers,
Avril की वो मरी हुई आवाज़,
Blue Ray की वो 8 Gb की movies,
HIMYM, PB, Heroes, F.R.I.E.N.D.S की वो धडाधड sequels,
TS के समय की वो slides,
लोगों के कारनामों की वो print screens,
Paint पर बनाये वो सारे claasy art works,
Photoshop के वो सारे तिकड़म,
याद तो आये पर निकल गए एक-एक करके
पलकों में से आंसुओं के रूप में,
फिर सोचा हंसते-हंसते विदा करूँगा उसे
जिसने हमेशा साथ निभाया अपने उस जीवित रूप में |
देखता रहा, कभी उस काले हो चुके ENTER को,
तो कभी उस USB mouse को,
भूख तक bore होकर चली गयी थी जब
सुबह 6:13 को एक काले प्राणी ने कमरे में दर्शन दिया,
बोलना शुरू किया उसने
"रात भर सोया नहीं है क्या, आँखें लाल हैं तेरी
अच्छा सुन, तेरे Invertor का plug निकाल दिया था मैंने कल
लगा लियो उसे" |
देखता रहा बस तेरी उस मृत शरीर को,
मंडराने लगे वो सारे पल आँखों के सामने एक-एक करके
जो गुजारे थे मैंने कभी तेरे साथ |
Orkut की वो खुली हुई scrapbook,
Facebook पर खेले वो सारे time-pass games,
Gtalk की वो ping-ping की आवाज़,
Messenger की वो smileys और वो नशीली लाल backgrounds,
CS की वो go-go-go,
AOE की वो भोंपू ,
Mario की वो उछल-कूद,
Taken की वो घटिया graphics,
50 cent और linkin park के वो romantic numbers,
Avril की वो मरी हुई आवाज़,
Blue Ray की वो 8 Gb की movies,
HIMYM, PB, Heroes, F.R.I.E.N.D.S की वो धडाधड sequels,
TS के समय की वो slides,
लोगों के कारनामों की वो print screens,
Paint पर बनाये वो सारे claasy art works,
Photoshop के वो सारे तिकड़म,
याद तो आये पर निकल गए एक-एक करके
पलकों में से आंसुओं के रूप में,
फिर सोचा हंसते-हंसते विदा करूँगा उसे
जिसने हमेशा साथ निभाया अपने उस जीवित रूप में |
देखता रहा, कभी उस काले हो चुके ENTER को,
तो कभी उस USB mouse को,
भूख तक bore होकर चली गयी थी जब
सुबह 6:13 को एक काले प्राणी ने कमरे में दर्शन दिया,
बोलना शुरू किया उसने
"रात भर सोया नहीं है क्या, आँखें लाल हैं तेरी
अच्छा सुन, तेरे Invertor का plug निकाल दिया था मैंने कल
लगा लियो उसे" |
Friday, May 15, 2009
आंसू
आंसू भी सूखने लगे हैं अब
धीरे धीरे नींद भी आने लगी है,
lawn में लगा वो कटहल का पेड़
अब फल देने लगा है,
बीतते हुए हर मौसम के साथ
वो भी तुझे अब भूलने लगा है,
12 साल पहले किसने उसे जीवन दिया था
शायद ही याद होगा उसे अब |
Drawimg room के tea-table के उपर रखी वो कलम
जिसकी स्याही शायद ही कभी सूखती थी,
उसकी nib कहीं खो गयी है
उसकी जगह तो अब भी नहीं बदली है,
पर तेरे लिए लिखे उन सारी कविताओं की खुशबू
अभी भी बाकी है उसमें |
album की सारी तस्वीरें अब धुंधली पड़ने लगी हैं
जिनमें हम साथ देखते थे कभी,
काई सी जमने लगी है हर एक पन्ने के कोने पर
कागज़ को छूने से भी थोड़ा-थोड़ा डरने लगा हूँ मैं अब,
कहीं अलग होकर बिखर ना जाए ज़मीं पे
कुछ कुछ खोने सा लगा हूँ मैं अब |
तेरी काजल की डिबिया वहीँ टेबल के उपर रखी हुई है,
कोने की दिवार से सटकर, पड़े पड़े अब धूल की मेहमान बनी हुई है,
ढ़लते हुए हर दिन के साथ
जब इस कमरे में बत्तियां जलाने आता हूँ,
उसके एक-एक हिस्से को देखकर लगता है जैसे
तुझे भूलने की कोशिश कर रही हों |
शीशम से बनी उस shelf में रखी उन
Tagore की किताबों के बीच, कांच पर कभी कभी
तेरी परछाई दिखाई देती थी,
आँखों से आंसू निकल आया करती थी,
रातों को नींद तो साथ छोड़ ही दिया करती थी,
दिन में पलकें भी झपकना बंद दिया करतीं थीं |
पर अब तो मेरी धड़कन तक तुझे भूलने लगी है,
ना जाने क्यों, धड़कना बंद कर दिया है उसने
आंसू तो सूखने ही लगे हैं,
धीरे-धीरे नींद भी आने लगी है अब |
धीरे धीरे नींद भी आने लगी है,
lawn में लगा वो कटहल का पेड़
अब फल देने लगा है,
बीतते हुए हर मौसम के साथ
वो भी तुझे अब भूलने लगा है,
12 साल पहले किसने उसे जीवन दिया था
शायद ही याद होगा उसे अब |
Drawimg room के tea-table के उपर रखी वो कलम
जिसकी स्याही शायद ही कभी सूखती थी,
उसकी nib कहीं खो गयी है
उसकी जगह तो अब भी नहीं बदली है,
पर तेरे लिए लिखे उन सारी कविताओं की खुशबू
अभी भी बाकी है उसमें |
album की सारी तस्वीरें अब धुंधली पड़ने लगी हैं
जिनमें हम साथ देखते थे कभी,
काई सी जमने लगी है हर एक पन्ने के कोने पर
कागज़ को छूने से भी थोड़ा-थोड़ा डरने लगा हूँ मैं अब,
कहीं अलग होकर बिखर ना जाए ज़मीं पे
कुछ कुछ खोने सा लगा हूँ मैं अब |
तेरी काजल की डिबिया वहीँ टेबल के उपर रखी हुई है,
कोने की दिवार से सटकर, पड़े पड़े अब धूल की मेहमान बनी हुई है,
ढ़लते हुए हर दिन के साथ
जब इस कमरे में बत्तियां जलाने आता हूँ,
उसके एक-एक हिस्से को देखकर लगता है जैसे
तुझे भूलने की कोशिश कर रही हों |
शीशम से बनी उस shelf में रखी उन
Tagore की किताबों के बीच, कांच पर कभी कभी
तेरी परछाई दिखाई देती थी,
आँखों से आंसू निकल आया करती थी,
रातों को नींद तो साथ छोड़ ही दिया करती थी,
दिन में पलकें भी झपकना बंद दिया करतीं थीं |
पर अब तो मेरी धड़कन तक तुझे भूलने लगी है,
ना जाने क्यों, धड़कना बंद कर दिया है उसने
आंसू तो सूखने ही लगे हैं,
धीरे-धीरे नींद भी आने लगी है अब |
Wednesday, April 8, 2009
बस एक लम्हे का झगडा था
Someone just called ......
चाहते तो रुक सकते थे उस दिन
कमी रह गयी तो बस सिर्फ,
कुछ अल्फाजों की
बस एक बार नज़रें मिलाने की,
सोच और सांस एक हुआ करते थे कभी
साथ उठते थे ,साथ चलते थे कदम,
आखों की हलचल सारी कहानी बयां कर दिया करती थी
सुकून मिलता था रूह को
सिर्फ इतनी सी ही थी शब्दों की अहमियत,
अचानक मौसम ने कुछ ऐसा रुख बदला
आसमां भी सर पर भारी लगने लगा,
रास्ता भी कुछ धुंधला सा लगने लगा था
देखते ही देखते काले पड़ने लगे थे वो दिन
एक-एक लव्ज़ अब
शतरंज के प्यादों की तरह लगने लगा था,
भले ही छोटे और आसान होते थे
पर हर तरफ से काटने को दौड़ते
हर एक नज़र अब
मन की तस्वीर को तोड़ जाती थी,
जैसे कांच टूटता है
हर एक टुकड़े में वो साहिल नज़र आता था
जिसके सपने साथ-साथ देखे थे कभी
आंसू तो थे पलकों पर उनके
बस इस बार साथ बह ना सके,
बस एक लम्हे का झगडा था वो
चाहते तो रुक सकते थे उस दिन !
चाहते तो रुक सकते थे उस दिन
कमी रह गयी तो बस सिर्फ,
कुछ अल्फाजों की
बस एक बार नज़रें मिलाने की,
सोच और सांस एक हुआ करते थे कभी
साथ उठते थे ,साथ चलते थे कदम,
आखों की हलचल सारी कहानी बयां कर दिया करती थी
सुकून मिलता था रूह को
सिर्फ इतनी सी ही थी शब्दों की अहमियत,
अचानक मौसम ने कुछ ऐसा रुख बदला
आसमां भी सर पर भारी लगने लगा,
रास्ता भी कुछ धुंधला सा लगने लगा था
देखते ही देखते काले पड़ने लगे थे वो दिन
एक-एक लव्ज़ अब
शतरंज के प्यादों की तरह लगने लगा था,
भले ही छोटे और आसान होते थे
पर हर तरफ से काटने को दौड़ते
हर एक नज़र अब
मन की तस्वीर को तोड़ जाती थी,
जैसे कांच टूटता है
हर एक टुकड़े में वो साहिल नज़र आता था
जिसके सपने साथ-साथ देखे थे कभी
आंसू तो थे पलकों पर उनके
बस इस बार साथ बह ना सके,
बस एक लम्हे का झगडा था वो
चाहते तो रुक सकते थे उस दिन !
Sunday, April 5, 2009
ज़माना था ....
ज़माना था जब हम नवाब हुआ करते थे
रिक्शे पर बैठकर स्कूल जाया करते थे,
रथ पर हमारे साथ चार मंत्री और चला करते थे
यात्रा के दौरान भोजन सम्बन्धी राजनीति किया करते थे !
सूर्यदेव की पहली आवाज़ के साथ उठा दिए जाते थे
सोचा करते थे,
सूरज मामू के बाकी कार्यों के विषय में
जिन्हें त्यागकर वो अपना सारा ध्यान मुझपर लगाया करते थे !
ज़माना था जब हम नवाब हुआ करते थे
गुसलखाने से भी इंतज़ार करवाया करते थे
नाश्ते में colgate लिया करते थे,
और ये नाश्ता पूरे 20 मिनट तक किया करते थे !
आश्चर्य की बात तो ये थी कि
तब हम रोज़ नहाया करते थे,
शान से वर्दी धारण कर
माताश्री को भगाया करते थे !
पकडे जाने पर TV के सामने बैठकर चुपचाप
दूसरी बार नाश्ता करते थे,
TV देखना जारी रहता था तब
पिताश्री पधारते थे !
सामने आकर हाथ बांधकर खड़े हो जाते थे
तब हम चुपचाप TV बंद कर देते थे,
आदत तो हमें पड़ ही चुकी थी
मार तो हम हर सुबह खाते थे !
रोते रोते जूते घिसते थे
पिताश्री फिर आकर खड़े हो जाते थे,
सच मानिए, हम तुंरत ही रोना बंद कर देते थे
और जाकर अपना बस्ता सजाते थे !
जब हमारा सारथी सड़क पर खड़े होकर चीखता था
तब हम शान से बस्ता ले जा कर उसे थमा देते थे,
आखिर तब हम नवाब हुआ करते थे
रिक्शे से स्कूल जाया करते थे !
Saturday, April 4, 2009
A moment for thoughts
ये ख्याल आता है .......
बिछौने के बगल में कोने की दिवार की टपकती छत को देखकर
ये ख्याल आता है,
गर्मियों में उस टूटे हुए पुल को देखकर
ये ख्याल आता है,
पुलिस की वर्दी में छिपे हुए उस चोर को देखकर
ये ख्याल आता है,
फुटपाथ पर सोते हुए उस विशाल सेना को देखकर
ये ख्याल आता है,
घर के रोज़-रोज़ के झगडों को देखकर
ये ख्याल आता है,
ज़िन्दगी के बीच सफ़र में उस बढे हुए हाथ को देखकर
ये ख्याल आता है,
दर-दर की ठोकरें खाते अपनों के उन नम पलकों को देखकर
ये ख्याल आता है,
अपने बीच ही उस महकते बचपन को देखकर
ये ख्याल आता है,
दूसरों के लिए धड़कने वाले उस दिल को देखकर
ये ख्याल आता है,
वैसे तो ज़िन्दगी गुजारने के लिए बहुत लम्बी है
पर हार कर भी जीने वाले उस रूह को देखकर,
ये ख्याल आता है,
कि कहीं देर ना हो जाए !!
बिछौने के बगल में कोने की दिवार की टपकती छत को देखकर
ये ख्याल आता है,
गर्मियों में उस टूटे हुए पुल को देखकर
ये ख्याल आता है,
पुलिस की वर्दी में छिपे हुए उस चोर को देखकर
ये ख्याल आता है,
फुटपाथ पर सोते हुए उस विशाल सेना को देखकर
ये ख्याल आता है,
घर के रोज़-रोज़ के झगडों को देखकर
ये ख्याल आता है,
ज़िन्दगी के बीच सफ़र में उस बढे हुए हाथ को देखकर
ये ख्याल आता है,
दर-दर की ठोकरें खाते अपनों के उन नम पलकों को देखकर
ये ख्याल आता है,
अपने बीच ही उस महकते बचपन को देखकर
ये ख्याल आता है,
दूसरों के लिए धड़कने वाले उस दिल को देखकर
ये ख्याल आता है,
वैसे तो ज़िन्दगी गुजारने के लिए बहुत लम्बी है
पर हार कर भी जीने वाले उस रूह को देखकर,
ये ख्याल आता है,
कि कहीं देर ना हो जाए !!
सोच कभी
कुछ लोग दूर रहकर भी पास थे मेरे .....
सोच कभी
उन लम्हों को जो कभी हसीं हुआ करते थे;
पलकों को नम कर दिया करते थे,
बैठे बैठे किसी अनजाने दुनिया की सैर करा दिया करते थे !
सोच कभी
उस उम्र को जो मासूम हुआ करती थी;
यार अपने और हम उनके हुआ करते थे,
ज़मीन में रहकर भी आसमां में उड़ा करते थे !
सोच कभी
उन आदर्शों को जो शायद ही हम माना करते थे;
उन नियमों को जो हम हँसते हँसते टाल दिया करते थे,
जो मात्र आने के लिए और फिर जाने के लिए हुआ करते थे !
आज बारी है ज़िन्दगी को मुड़कर देखने की
जो खो दिया है उन रिश्तों को खोज निकालने की;
अपनों के पास वापस आने की,
माफ़ी मांगने की !!
सोच कभी
उन लम्हों को जो कभी हसीं हुआ करते थे;
पलकों को नम कर दिया करते थे,
बैठे बैठे किसी अनजाने दुनिया की सैर करा दिया करते थे !
सोच कभी
उस उम्र को जो मासूम हुआ करती थी;
यार अपने और हम उनके हुआ करते थे,
ज़मीन में रहकर भी आसमां में उड़ा करते थे !
सोच कभी
उन आदर्शों को जो शायद ही हम माना करते थे;
उन नियमों को जो हम हँसते हँसते टाल दिया करते थे,
जो मात्र आने के लिए और फिर जाने के लिए हुआ करते थे !
आज बारी है ज़िन्दगी को मुड़कर देखने की
जो खो दिया है उन रिश्तों को खोज निकालने की;
अपनों के पास वापस आने की,
माफ़ी मांगने की !!
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